प्राकृतिक चिकित्सा से हारा टाइफाइड बुखार कभी वापस नहीं आया

डॉ. राजेश कुमार को 2008 में सिर दर्द, बुखार, ठंड लगना, कमजोरी और मिचली जैसे लक्षणों के बाद जांच में टाइफाइड की पुष्टि हुई। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा, खानपान में बदलाव और जीवनशैली के माध्यम से अपने स्वास्थ्य में सुधार का अनुभव साझा किया।
2008 में खराब दिनचर्या और खानपान के दौरान बारिश में भीगने के बाद डॉ. राजेश कुमार को पूरे शरीर में दर्द, सिर दर्द, बुखार, ठंड लगना और कमजोरी शुरू हुई। बाद में रक्त जांच में विडाल टेस्ट पॉजिटिव आया और टाइफाइड की पुष्टि हुई।
डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, प्राकृतिक उपचार और बदले हुए खानपान को अपनाने के लगभग 6 दिनों के अंदर सिर दर्द, ठंड लगना और बुखार गायब हो गया। उन्होंने आगे भी चना, मूंग, अंकुरित खाद्य पदार्थ, खीरा, मौसमी फल और हरी पत्तेदार सब्जियों को अपने आहार में शामिल रखा और नियमित योग व प्राणायाम का अभ्यास जारी रखा।
2008 में खराब दिनचर्या और खानपान के दौरान बारिश में भीगने के बाद डॉ. राजेश कुमार को पूरे शरीर में दर्द, सिर दर्द, बुखार, ठंड लगना और कमजोरी शुरू हुई। बाद में रक्त जांच में विडाल टेस्ट पॉजिटिव आया और टाइफाइड की पुष्टि हुई।
डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, प्राकृतिक उपचार और बदले हुए खानपान को अपनाने के लगभग 6 दिनों के अंदर सिर दर्द, ठंड लगना और बुखार गायब हो गया। उन्होंने आगे भी चना, मूंग, अंकुरित खाद्य पदार्थ, खीरा, मौसमी फल और हरी पत्तेदार सब्जियों को अपने आहार में शामिल रखा और नियमित योग व प्राणायाम का अभ्यास जारी रखा।
प्राकृतिक चिकित्सा, योग, उचित दिनचर्या और प्राकृतिक एवं पौध-आधारित भोजन के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखना तथा लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना।

डॉ. राजेश कुमार ,उम्र 36 वर्ष,

DNYT,BNYS,IMS,BHU,

योग व प्राकृतिक चिकित्सक,

पता- ग्राम -भभुआर ,नारायणपुर जिला- मिर्जापुर,

उत्तर प्रदेश I

रोग की शुरुआत-

बात 2008 की है, उस समय मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में डिप्लोमा इन नेचुरोपैथी एंड योग थेरेपी में प्रथम वर्ष का छात्र था, वार्षिक परीक्षा नजदीक होने की वजह से मेरी दिनचर्या व खानपान बिगड़ गया, एक दिन मैं बारिश में भीग गया, परिणाम यह हुआ कि मेरे पूरे शरीर में दर्द, सिर दर्द, बुखार, ठंड लगना , कमजोरी,इत्यादि शुरू हो गए , शुरू में तो मैंने सोचा कि यह ठीक हो जाएगा लेकिन बढ़ता ही गया I

बचपन में ही एलोपैथी को नकारा-

इसके पहले मैं जब मात्र 5 वर्ष का था; तो एक बार बीमार पड़ा था ,मुझे अच्छी तरीके से याद है कि डॉक्टर ने हमें बुखार की दवा देने से पहले पूछा था, कि टिकिया खा लोगे कि नहीं, तो मां की तरफ देखते हुए हमने पूछा – कैसा लगेगा ,डॉक्टर साहब बोले – कड़वी , डॉक्टर साहब समझ गये ,उन्होंने उसे एक मीठी लाल सिरप में घोलकर मुझे दिया, उसका मैंने केवल 1 दिन ही सेवन किया I

प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति रुझान-

उसके बाद मैं कभी भी बीमार नहीं पड़ा; क्योंकि मेरे पिताजी रोज शाम को सोते समय एक गिलास में पानी लेकर चना भीगा देते थे, रोज सुबह भीगे हुए चने का पानी पिलाते थे और चना खाने के लिए दे देते थे, 2008 में चना खाने का यह क्रम टूट गया; खराब दिनचर्या व खान-पान की वजह से मैं बीमार पड़ गया I

रोग की शुरुआत-

एकदिन मैं बारिश में भीग गया, मुझे सिर दर्द ,बुखार व मिचली इत्यादि आने लगा I

शुरुआत में तो हमने बहुत ध्यान नहीं दिया ,लेकिन जब रोग बढ़ता जा रहा था तो हमने रक्त की जांच कराई जिसमें विडाल टेस्ट पॉजिटिव (टायफाइड) था I

एलोपैथी दवाओं का दुष्प्रभाव

एलोपैथी दवाओं से आंत में स्थित फ्लोरा चपटे या नष्ट हो जाते हैं , भोजन का पाचन ,अवशोषण व निष्कासन सही से नहीं हो पाता, शरीर में अम्लीयता बढ़ने लगती है व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है ,जिससे शरीर के अंग अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाते !

प्राकृतिक उपचार –

मुझे दवाइयों के दुष्प्रभाव के बारे में पता था,अतः मैं एलोपैथिक दवाई नहीं लेना चाहता था !

हमने अपने चिकित्सक शिक्षक (प्राकृतिक चिकित्सा) से संपर्क किया; उन्होंने हमें प्रतिदिन प्रातःगुनगुने पानी व नींबू का रस, सेव और मुनक्का खाने की सलाह दी, वैसे ही शुरुआत कर दिया Iजब भी कक्षा खत्म होती, 1 लीटर पानी पीता, दिन भर में 4 – 5 लीटर पानी पीना प्रारंभ किया और साथ में शाम को केवल खीरा खाना प्रारंभ कर दिया, मात्र6 दिन के अंदर ही मेरा सिर दर्द, ठंड लगना व बुखार गायब हो गया था I

चिकित्सक महोदय ने मुझे 15 से 20 दिन तक ऐसा करने की सलाह दी थी, लेकिन मैंने कुल 60 दिन ऐसा ही किया, अब मेरे शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की कमजोरी,आलस्य ,थकान, बुखार नहीं था I यहां तक की मैंने महसूस किया कि मेरी याद करने की क्षमता, एकाग्रता भी बढ़ चुकी थी; ऊर्जा परीक्षण के लिए हम लोगों ने दौड़ लगाई, जिसमें मैंने अपने वरिष्ठ छात्र को हरा दिया, जो कि रोज दौड़ लगाया करते थे I

इसके बाद मैंने फिर से चना, मूंग अंकुरित करके व खीरा प्रतिदिन खाना प्रारंभ कर दिया I

सन् 2013 में मैं 3 महीने केवल 250 ग्राम प्रतिदिन खीरा खा कर रहा उसी दौरान मैंने “जीवन शैली से दीर्घायु की ओर“नाम की अपनी प्रथम पुस्तक लिखी I

राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान पुणे व केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में अपने बी.एन.वाई.एस.(Bachelor of Naturopathy and yoga sciences )के इंटर्नशिप के दौरान मैंने 6 महीने केवल प्रातः चना, मूंग अंकुरित करके व शाम को उबली हुई सब्जियां व दाल व सलाद खा कर रहा I

वर्तमान समय में दिनचर्या व खानपान का परिदृश्य-

  • प्राणायाम-वर्तमान समय में प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय से पहले कपालभाति, अनुलोम विलोम,भस्त्रिका, भ्रामरी प्राणायाम, (15 मिनट)- मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है जिससे वह अपना कार्य सुचारू रूप से करता रहता है !
  • क्रिया-(सप्ताह में एक दिन) -जलनेतिव वमन धौति!
  • जलनेति – नाक और साइनस में जमा श्लेष्मा व गंदगी को बाहर निकालती है जिससे सिर में हल्कापन व ताजगी की अनुभूति होती है , मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ जाती है !
  • वमन धौति – भोजन नली व पेट में स्थित दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं ; अपच, अम्लता और गैस की समस्याएं समाप्त हो जाती है ,पेट की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है !
  • मौसमी फल व हरी पत्तेदार सब्जियों के जूस व सलाद के सेवन से शरीर में स्थित क्षारीयता संतुलित रहती है ,रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है व शरीर के सभी अंग सुचारू रूप से अपना कार्य करते हैं !
  • प्रतिदिन प्रातः 7:00 बजे – पपीता की पत्ती /एलोवेरा/अनार या टमाटर का जूस (300 ml)
  • सलाद- खीरा ,टमाटर ,प्याज, मूली ! (400 – 500 ग्राम प्रातः एवं सायं)
  • एक कटोरी चावल, एक रोटी, एक कटोरी दाल/उबली हुई सब्जियां (सायं 7:00 बजे)

निष्कर्ष-

शरीर के अंदर समस्त रोगों को ठीक करने की स्वत:क्षमता होती है, लेकिन खराब दिनचर्या व अम्लीय भोजन की वजह से वे सही तरीके से नहीं कार्य कर पाते, भोजन में अधिकतर मौसमी फल व कच्ची हरी पत्तेदार सब्जियों केे सेवन से शरीर में अम्ल- क्षार का संतुलन बना रहता है , रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और हम स्वस्थ हो जाते हैं !

डॉ .राजेश कुमार ,

DNYT, BNYS, IMS ,BHU,

योग व नेचुरोपैथी फिजीशियन ;

उद्देश्य* – योग, नेचुरोपैथी , भोजन में 80% क्षारीय व 20% अम्लीय भोजन को शामिल करने को प्रेरित करना व जैविक घड़ी के हिसाब से सही दिनचर्या की सहायता से मानव जाति को स्वस्थ करना , जैसे- नभचर ,जलचर व स्थल के सभी प्राणी स्वस्थ और प्रसन्न चित्त रहते हैं व अपनी आयु काल पूरी करते हैं I*

(डॉ. राजेश कुमार ,स्वस्थ भारत अभियानस्वास्थ्य पर चर्चा नामक कार्यक्रम चलाकर ग्राम वासियों व विद्यार्थियों को सही जीवनशैली व प्राकृतिक उपचार के बारे में जागरूक कर रहे हैं।)

Healing journeys are personal experiences, not medical guarantees. Results vary by individual. Use this story as informational content and consult a qualified healthcare professional for personal medical advice.

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प्राकृतिक चिकित्सा, योग, उचित दिनचर्या और प्राकृतिक एवं पौध-आधारित भोजन के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखना तथा लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना।

डॉ. राजेश कुमार ,उम्र 36 वर्ष,

DNYT,BNYS,IMS,BHU,

योग व प्राकृतिक चिकित्सक,

पता- ग्राम -भभुआर ,नारायणपुर जिला- मिर्जापुर,

उत्तर प्रदेश I

रोग की शुरुआत-

बात 2008 की है, उस समय मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में डिप्लोमा इन नेचुरोपैथी एंड योग थेरेपी में प्रथम वर्ष का छात्र था, वार्षिक परीक्षा नजदीक होने की वजह से मेरी दिनचर्या व खानपान बिगड़ गया, एक दिन मैं बारिश में भीग गया, परिणाम यह हुआ कि मेरे पूरे शरीर में दर्द, सिर दर्द, बुखार, ठंड लगना , कमजोरी,इत्यादि शुरू हो गए , शुरू में तो मैंने सोचा कि यह ठीक हो जाएगा लेकिन बढ़ता ही गया I

बचपन में ही एलोपैथी को नकारा-

इसके पहले मैं जब मात्र 5 वर्ष का था; तो एक बार बीमार पड़ा था ,मुझे अच्छी तरीके से याद है कि डॉक्टर ने हमें बुखार की दवा देने से पहले पूछा था, कि टिकिया खा लोगे कि नहीं, तो मां की तरफ देखते हुए हमने पूछा – कैसा लगेगा ,डॉक्टर साहब बोले – कड़वी , डॉक्टर साहब समझ गये ,उन्होंने उसे एक मीठी लाल सिरप में घोलकर मुझे दिया, उसका मैंने केवल 1 दिन ही सेवन किया I

प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति रुझान-

उसके बाद मैं कभी भी बीमार नहीं पड़ा; क्योंकि मेरे पिताजी रोज शाम को सोते समय एक गिलास में पानी लेकर चना भीगा देते थे, रोज सुबह भीगे हुए चने का पानी पिलाते थे और चना खाने के लिए दे देते थे, 2008 में चना खाने का यह क्रम टूट गया; खराब दिनचर्या व खान-पान की वजह से मैं बीमार पड़ गया I

रोग की शुरुआत-

एकदिन मैं बारिश में भीग गया, मुझे सिर दर्द ,बुखार व मिचली इत्यादि आने लगा I

शुरुआत में तो हमने बहुत ध्यान नहीं दिया ,लेकिन जब रोग बढ़ता जा रहा था तो हमने रक्त की जांच कराई जिसमें विडाल टेस्ट पॉजिटिव (टायफाइड) था I

एलोपैथी दवाओं का दुष्प्रभाव

एलोपैथी दवाओं से आंत में स्थित फ्लोरा चपटे या नष्ट हो जाते हैं , भोजन का पाचन ,अवशोषण व निष्कासन सही से नहीं हो पाता, शरीर में अम्लीयता बढ़ने लगती है व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है ,जिससे शरीर के अंग अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाते !

प्राकृतिक उपचार –

मुझे दवाइयों के दुष्प्रभाव के बारे में पता था,अतः मैं एलोपैथिक दवाई नहीं लेना चाहता था !

हमने अपने चिकित्सक शिक्षक (प्राकृतिक चिकित्सा) से संपर्क किया; उन्होंने हमें प्रतिदिन प्रातःगुनगुने पानी व नींबू का रस, सेव और मुनक्का खाने की सलाह दी, वैसे ही शुरुआत कर दिया Iजब भी कक्षा खत्म होती, 1 लीटर पानी पीता, दिन भर में 4 – 5 लीटर पानी पीना प्रारंभ किया और साथ में शाम को केवल खीरा खाना प्रारंभ कर दिया, मात्र6 दिन के अंदर ही मेरा सिर दर्द, ठंड लगना व बुखार गायब हो गया था I

चिकित्सक महोदय ने मुझे 15 से 20 दिन तक ऐसा करने की सलाह दी थी, लेकिन मैंने कुल 60 दिन ऐसा ही किया, अब मेरे शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की कमजोरी,आलस्य ,थकान, बुखार नहीं था I यहां तक की मैंने महसूस किया कि मेरी याद करने की क्षमता, एकाग्रता भी बढ़ चुकी थी; ऊर्जा परीक्षण के लिए हम लोगों ने दौड़ लगाई, जिसमें मैंने अपने वरिष्ठ छात्र को हरा दिया, जो कि रोज दौड़ लगाया करते थे I

इसके बाद मैंने फिर से चना, मूंग अंकुरित करके व खीरा प्रतिदिन खाना प्रारंभ कर दिया I

सन् 2013 में मैं 3 महीने केवल 250 ग्राम प्रतिदिन खीरा खा कर रहा उसी दौरान मैंने “जीवन शैली से दीर्घायु की ओर“नाम की अपनी प्रथम पुस्तक लिखी I

राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान पुणे व केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में अपने बी.एन.वाई.एस.(Bachelor of Naturopathy and yoga sciences )के इंटर्नशिप के दौरान मैंने 6 महीने केवल प्रातः चना, मूंग अंकुरित करके व शाम को उबली हुई सब्जियां व दाल व सलाद खा कर रहा I

वर्तमान समय में दिनचर्या व खानपान का परिदृश्य-

  • प्राणायाम-वर्तमान समय में प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय से पहले कपालभाति, अनुलोम विलोम,भस्त्रिका, भ्रामरी प्राणायाम, (15 मिनट)- मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है जिससे वह अपना कार्य सुचारू रूप से करता रहता है !
  • क्रिया-(सप्ताह में एक दिन) -जलनेतिव वमन धौति!
  • जलनेति – नाक और साइनस में जमा श्लेष्मा व गंदगी को बाहर निकालती है जिससे सिर में हल्कापन व ताजगी की अनुभूति होती है , मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ जाती है !
  • वमन धौति – भोजन नली व पेट में स्थित दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं ; अपच, अम्लता और गैस की समस्याएं समाप्त हो जाती है ,पेट की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है !
  • मौसमी फल व हरी पत्तेदार सब्जियों के जूस व सलाद के सेवन से शरीर में स्थित क्षारीयता संतुलित रहती है ,रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है व शरीर के सभी अंग सुचारू रूप से अपना कार्य करते हैं !
  • प्रतिदिन प्रातः 7:00 बजे – पपीता की पत्ती /एलोवेरा/अनार या टमाटर का जूस (300 ml)
  • सलाद- खीरा ,टमाटर ,प्याज, मूली ! (400 – 500 ग्राम प्रातः एवं सायं)
  • एक कटोरी चावल, एक रोटी, एक कटोरी दाल/उबली हुई सब्जियां (सायं 7:00 बजे)

निष्कर्ष-

शरीर के अंदर समस्त रोगों को ठीक करने की स्वत:क्षमता होती है, लेकिन खराब दिनचर्या व अम्लीय भोजन की वजह से वे सही तरीके से नहीं कार्य कर पाते, भोजन में अधिकतर मौसमी फल व कच्ची हरी पत्तेदार सब्जियों केे सेवन से शरीर में अम्ल- क्षार का संतुलन बना रहता है , रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और हम स्वस्थ हो जाते हैं !

डॉ .राजेश कुमार ,

DNYT, BNYS, IMS ,BHU,

योग व नेचुरोपैथी फिजीशियन ;

उद्देश्य* – योग, नेचुरोपैथी , भोजन में 80% क्षारीय व 20% अम्लीय भोजन को शामिल करने को प्रेरित करना व जैविक घड़ी के हिसाब से सही दिनचर्या की सहायता से मानव जाति को स्वस्थ करना , जैसे- नभचर ,जलचर व स्थल के सभी प्राणी स्वस्थ और प्रसन्न चित्त रहते हैं व अपनी आयु काल पूरी करते हैं I*

(डॉ. राजेश कुमार ,स्वस्थ भारत अभियानस्वास्थ्य पर चर्चा नामक कार्यक्रम चलाकर ग्राम वासियों व विद्यार्थियों को सही जीवनशैली व प्राकृतिक उपचार के बारे में जागरूक कर रहे हैं।)

Healing journeys are personal experiences, not medical guarantees. Results vary by individual. Use this story as informational content and consult a qualified healthcare professional for personal medical advice.

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